शिक्षा की बदहाल तस्वीर बया करती जिले से सटा एक सरकारी स्कूल –

चंदौली से शर्मसार कर देने वाली तस्वीर,बदहाल शिक्षा व्यवस्था की बानगी है ‘आदि हिन्दू प्राथमिक विद्यालय रेवसा..
चंदौली। शिक्षा के मंदिर की यह तस्वीर आपको झकझोर देगी। जनपद के रेवसा स्थित आदि हिन्दू प्राथमिक विद्यालय आज बदहाली का प्रतीक बन चुका है। आजादी से पहले वर्ष 1936 में स्थापित यह विद्यालय अब अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है।
एक ओर सरकारें शिक्षा को उच्च स्तर पर ले जाने के लिए अरबों रुपये खर्च कर रही हैं, वहीं समाज कल्याण विभाग की उदासीनता इस विद्यालय को बर्बादी की कगार पर ले आई है।
विद्यालय परिषदीय नहीं है,बल्कि समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित है। यही कारण है कि जिम्मेदार अधिकारी एसी कमरों में बैठकर विकास के दावे कर रहे हैं, जबकि बच्चे मूलभूत सुविधाओं के अभाव में कुंठित भावना के शिकार बन रहे हैं।
विद्यालय में कक्षा पाँचवीं तक की पढ़ाई होती है, लेकिन आज भी यह टीनसेड के जर्जर भवन में संचालित है। बच्चे जमीन पर दरी बिछाकर शिक्षा ग्रहण करने को मजबूर हैं। हालात इतने बदतर हैं कि विद्यालय में शौचालय की सुविधा तक नहीं है, जिससे नौनिहाल खुले में शौच जाने को विवश हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि विद्यालय में 66 बच्चों का नामांकन है, लेकिन पढ़ाने के लिए सिर्फ दो शिक्षक ही तैनात हैं। सवाल उठता है आखिर दो अध्यापक इतने बच्चों को कैसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे सकते हैं।
विडंबना यह भी है कि इसी जर्जर भवन में आंगनवाड़ी केंद्र भी संचालित हो रहा है, जिसमें करीब 150 बच्चों की उपस्थिति दर्ज की जाती है। यानी एक ही खंडहरनुमा भवन में दो संस्थान — शिक्षा और पोषण दोनों का “ढोंग” साथ-साथ चल रहा है।
जब पत्रकारों की टीम मौके पर पहुँची,तो विद्यालय में केवल एक शिक्षिका उपस्थित मिलीं,जो प्रधानाचार्या भी हैं। जबकि सहायक अध्यापक राणा प्रताप विद्यालय से नदारद पाए गये।
नीति आयोग की टीम ने हाल ही में जिले का दौरा कर शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण की समीक्षा की थी। लेकिन ज़मीनी सच्चाई रेवसा के इस विद्यालय में अब भी दम तोड़ रही है।
सरकारी बैठकों में अफसर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं और दावा कर रहे हैं “सब चंगा है। मगर हकीकत यह है कि रेवसा का यह विद्यालय अपनी आख़िरी सांसें गिन रहा है।




