धर्म, त्याग और कर्तव्य का प्रतीक है भीष्म द्वादशी

भीष्म द्वादशी हिन्दू धर्म का एक अत्यंत पवित्र पर्व है, जो माघ माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है। यह दिन महाभारत के महान योद्धा, धर्मज्ञ और ब्रह्मचारी पितामह भीष्म को समर्पित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी तिथि को पितामह भीष्म ने भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से उत्तरायण काल में देह त्याग किया था।
📅 भीष्म द्वादशी की तिथि व तारीख (2026)
- तिथि: माघ शुक्ल पक्ष द्वादशी
- तारीख: 30 जनवरी 2026 (शुक्रवार)
महाभारत युद्ध के बाद भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर पड़े रहे और सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करते हुए इसी पावन तिथि को प्राण त्याग किया। इसलिए यह पर्व धर्म, त्याग, सत्य और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक माना जाता है।
🕉️ धार्मिक महत्व
मान्यता है कि इस दिन भीष्म पितामह का तर्पण करने से पितरों की विशेष कृपा प्राप्त होती है और पितृ दोष से मुक्ति मिलती है। यह व्रत दीर्घायु, संतान सुख, यश और मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है।
⏰ तर्पण का शुभ मुहूर्त
- प्रातः काल से लेकर दोपहर 12 बजे तक तर्पण करना श्रेष्ठ माना जाता है।
- विशेष रूप से सूर्योदय के बाद का समय सबसे उत्तम होता है।
🙏 तर्पण व व्रत-पूजन की संक्षिप्त विधि
- प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें
- सूर्य देव को जल अर्पित करें
- कुश, तिल और जल लेकर दक्षिण दिशा की ओर मुख कर
भीष्म पितामह का तर्पण करें - “ॐ भीष्माय नमः” मंत्र का जाप करें
- सामर्थ्य अनुसार व्रत रखें
- ब्राह्मण या जरूरतमंद को अन्न, वस्त्र या दान दें
भीष्म द्वादशी हमें यह संदेश देती है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी धर्म और कर्तव्य का पालन ही मानव जीवन का सर्वोच्च आदर्श है।


