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डीडीयू रेलवे मंडल रेल अस्पताल के डॉक्टरों पर गंभीर आरोप, निजी अस्पताल लैब से टाइ-अप करा कर मरीज रेफर और रेलवे से भुगतान निकलवाने का खेल?


चंदौली।
डीडीयू रेलवे मंडल रेल अस्पताल (लोको हॉस्पिटल) से जुड़े कुछ डॉक्टरों को लेकर सामने आए आरोप अब बेहद गंभीर होते जा रहे हैं। सूत्रों और रेलवे कर्मचारियों का दावा है कि ये डॉक्टर केवल रेलवे के चिकित्सक ही नहीं, बल्कि खुद ही प्राइवेट अस्पताल और पैथोलॉजी लैब के मालिक व संचालक भी हैं।

सबसे बड़ा आरोप यह है कि इन डॉक्टरों ने अपने ही निजी अस्पतालों और पैथोलॉजी सेंटरों से रेलवे का टाई-अप करा रखा है और उसी का फायदा उठाकर मंडल रेल अस्पताल से मरीजों को योजनाबद्ध तरीके से अपने निजी अस्पतालों में रेफर किया जा रहा है।

रेलवे कर्मचारियों का कहना है कि अस्पताल में आने वाले मरीजों को

  • आगे की जांच या इलाज का हवाला देकर,
  • गंभीरता बताकर,
  • और “बेहतर सुविधा” का भरोसा दिलाकर
    उन्हीं डॉक्टरों के निजी अस्पतालों और लैबों में भेज दिया जाता है।
    रेलवे डॉक्टर होने के कारण मरीज भरोसा कर लेते हैं और सीधे उन्हीं निजी केंद्रों में पहुंच जाते हैं।

सबसे अहम और चौंकाने वाला आरोप यह है कि इस पूरे खेल में पैसा सीधे मरीज से नहीं लिया जाता, बल्कि रेफर किए गए मरीज के इलाज और जांच का भुगतान रेलवे से रिलीज कराया जाता है
रेलवे कर्मचारियों के बीच यह चर्चा तेज है कि

  • क्या रेलवे से भुगतान निकलवाने की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है?
  • क्या इसमें कमीशनखोरी या अंदरूनी सेटिंग का खेल चल रहा है?

सूत्रों का दावा है कि बार-बार चुनिंदा निजी अस्पतालों और लैबों को ही रेफरल और भुगतान मिलना संयोग नहीं, बल्कि एक तयशुदा सिस्टम का हिस्सा हो सकता है।

नियमों के अनुसार रेलवे डॉक्टरों को

  • निजी अस्पताल या पैथोलॉजी लैब चलाने,
  • सरकारी पद का उपयोग कर मरीजों को अपने संस्थानों में भेजने,
  • और रेलवे फंड से निजी लाभ लेने
    की अनुमति नहीं है। इसके बावजूद यदि आरोप सही हैं, तो यह सरकारी पद के दुरुपयोग और वित्तीय अनियमितता का गंभीर मामला बनता है।

सूत्र यह भी बता रहे हैं कि इन डॉक्टरों की कई संपत्तियां, अस्पताल और लैब
बेनामी नामों पर दर्ज हैं—कहीं रिश्तेदारों के नाम, तो कहीं कर्मचारियों या परिचितों के नाम पर। यदि
चल-अचल संपत्ति, बैंक लेन-देन, रेलवे भुगतान और टाई-अप रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच हो जाए, तो दूध का दूध और पानी का पानी हो सकता है।

रेलवे कर्मचारियों और आमजन के बीच अब यह सवाल खुलकर पूछा जा रहा है—

  • क्या मंडल रेल अस्पताल मरीजों के इलाज का केंद्र है या निजी अस्पतालों के लिए रेफरल और भुगतान पास कराने का जरिया?
  • क्या रेलवे प्रशासन और विजिलेंस विभाग को इस पूरे नेटवर्क की जानकारी नहीं है, या जानबूझकर अनदेखी की जा रही है?

यदि लगाए गए आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह मामला
भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी, सरकारी धन के दुरुपयोग और विश्वासघात का गंभीर प्रकरण बनता है।

अब मांग तेज हो रही है कि

  • पूरे मामले की रेलवे विजिलेंस व वित्तीय ऑडिट जांच कराई जाए,
  • डॉक्टरों की निजी अस्पताल–लैब और बेनामी संपत्तियों की जांच हो,
  • और दोषी पाए जाने पर कठोर विभागीय व कानूनी कार्रवाई की जाए।

जनता पूछ रही है—
क्या रेलवे का पैसा इलाज में लग रहा है या कुछ लोगों की गाढ़ी कमाई में?
और कब टूटेगा मंडल रेल अस्पताल से जुड़ा यह संदिग्ध नेटवर्क?


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